Thursday, March 5, 2020

मोदी जी ,मेरा उत्तर ये....

जब लौह पुरुष थे खड़े किए
इस देश को दृढ़ता देने को
तो प्रश्न कहाँ उठता है पार्थ
किसी भी रण को छोड़ने का!

हो पार्थ सारथी तो वही रहो
भारत की बुलंद आवाज़ हो तुम
जो लांघ गया सौ सागर भी
दिग्दृष्टि वाले बाज़ हो तुम।

रणछोड़ नहीं, हो कर्म वीर !
तो मुख मोड़ने की मत सोचो
देश का भाल रहे ऊंचा
तरकीब  नवेली सब सोचो।

रहो मुखर, कि मौन नहीं समझे
ये जग है बेसुर तानों सा ,
हो राग शांति और अमन का तुम
उत्तर हो तीर कमानों का।

Saturday, May 25, 2019

प्रयाण

घूम रही धरती की धुरी भी
अंबर की बोझिल आंखें
सूने हुए वृक्ष बिन पंछी
उड़ गए खोले पाँखें !

सांझ की बेला छोड़ना घर को
कुछ कहीं मन कुम्हलाया
उम्मीदों की डोर को थामे
पतंग सा मन उड़ पाया ।

सुबह न होगा गगन देश का
धरती होगी पराई,
संगत का संगीत ही होगा
बांसुरी और शहनाई।
सुनीता राजीव

निरर्थक युद्ध

कैसी होली कैसा उत्सव
कैसी हो धूम कैसा कलरव
ठंडी हो जिस चूल्हे की आग
बुझ गया जिसके घर का चिराग।

वो गया था देश की सीमा पे
छाती गगन सी चौड़ी कर के
23 बरस जिसे पाला था
वहशत का बना निवाला था।

है आज हाहाकार यहां
कल यही सरहद के पार भी था
है मातम में डूबा ये देश
कल वहां भी ऐसा मंज़र था।

ऐ काश कोई कहता उनसे
जो मौत के मंज़र बोते हैं
हो देश कोई दस्तूर कोई
मां बाप सभी के होते हैं।

आज यहां आंसू बहते
कल अश्क़ वहां पे छलके थे
हुआ चाक चाक जिगर उनका
बच्चे जो लिपट के रोते थे।


है हासिल क्या?सोचो तो ज़रा
ज़मीन क्या संग ले जाओगे?
इतना बैर जो पालोगे
किस खुदा को मना लोगे?

राम हो या हो रहीम कोई
रूह तो एक सी रमती है,
एक सीमा रेखा के कारण
क्यों दुश्मनी इतनी बनती है?

बहुत चली हैं बंदूकें
अब अमन हवा में बहने दो
मांओं की गोद उजाड़ो ना
बच्चों को अनाथ न होने दो।



लंकावी

कितना आंखों में भर लूं
आंखे बोलीं जब मन से,
बोला मन , भर ले प्याला
मैं हूँ, रख लूंगा जतन से।

सीना ताने हरियाली चादर
ओढ़े पर्वत ऊंचे,
राज़ सी गहरी शांत बिछी है
घाटी निर्मल वैसे।

जड़ें जकड़ कर मिट्टी को
अपना पन दिखलाती,
छोड़ेंगे ना तुमको हम सब
धीरज यही बंधाती।

देख नज़ारे मन ये कहता
कितना अद्भुत जीवन
हृदय सराबोर खुशी से
नाचे मयूर सा मन ।

मेघ हैं छाए हरित धरा पर
कल कल करता है जल
शुक्र करुं मैं कितना दाता ,
आनंदित है हर पल!
- सुनीता राजीव

Tuesday, March 5, 2019

मेरे देशवासियों को....

सड़क पे थूकें, हवा में नारे
ऐसा देश हमारा है।
नियम न माने फिर भी कोसे
कैसा देश संवारा है।

देश प्रगति की बात जो करते
वो दुश्मन कहलाते हैं।
भरष्टाचार को धुआं दिखाते
वो चोर कहलाते हैं।

युवा दिग्भ्रमित करके रोटी
अपने हित की सेंकते हैं।
चीख चीख कर दुनिया से वो
रक्षा सौदे परखते हैं।

अपना हित जब लगे जो घटने
अपनी सोच से उठते नहीं
डूबोगे फिर उसी गर्त में
आज भी अगर जागे नहीं।


Sunday, November 18, 2018

मेरे फौजी भाइयों ...



मेरे फौजी भाइयों ...

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जीवित हैं हम कि सीमा पे 
प्रहरी हो तुम  निर्भीक निडर,
आश्रित हैं हम कि सांसें गिरवी 

हैं ,न सोते तुम थक कर!

शर्मिंदा है कि इस पर  भी 

हम जश्न मनाते आये दिन
वहां रहते तुम चट्टानों में 
सारी सुख सुविधाओं के बिन।

यहां ज़िक्र हमेशा होता है

 नेताओं और अभिनेताओं का
ना हार चढ़े ना ही थाल सजे 
बस रक्त बहे  विजेताओं का।

हम याद तुम्हें तब करते हैं
जब आंधी तूफान आते हैं
जब बाढ़ में बहते जन जीवन
तुमको ही सहारा पाते हैं।

इन कंधों ने दुनाली ही नहीं
बेबस लोगों को उठाया है
इन हाथों ने मचाने  नहीं
नदियों पे भी बांध बनाया है।

हर रोम रोम अनुगृहित है बस
करे ईश्वर से पुकार यही
दो समझ अमन की देशों को
युद्ध की कोई दरकार नहीं।

पथराती आंखे मांओं की 
जो बाट तुम्हारी जोहती हैं
वो आंखों के तारे लौटें कब
हरदम ये सोचा करती हैं।

अमन और शांति विश्व मे हो
तो सेना राष्ट्र निर्माण करे
गोली बंदूकें त्यागे और
कर्मठ भारत पर मान करे।

Saturday, September 8, 2018

*हिंदी-भाषा हृदय की*

।*हिंदी-भाषा हृदय की*।
             -सुनीता राजीव

हिंदी भारत के माथे की
सौभाग्य सजी सी बिंदी है,
जो कभी गंगा सरीखी थी
आज हुई कालिंदी है।

भारतेंदु जी ने चेता था,
निज भाषा की कीमत जानो
उन्नति के पथ पर बढ़ना है
तो  महत्व हिंदी का जानो।

है विश्व हमारा कुटुम्ब मगर
हर जन ये कभी भी भूले ना,
ले चले साथ चाहे अंग्रेज़ी ,
पर अपनी बोली भूले ना ।

सम्मान हृदय में जब तक कि
अपनी भाषा का होगा ना,
तो स्थान विश्व में, कुछ भी करो,
निज देश का तब तक होगा ना।

चाहे चीन कहो जापान कहो
कहो बात फ्रांस या जर्मनी की
है सफल ये देश कि इन सब ने
जानी कीमत निज भाषा की।

कई वर्षों से आज़ाद हैं हम
पर हिंदी अब भी सकुचाती है,
अपनी ही भूमि में फिर क्यों
पनप नहीं वो पाती है?

कोई दोष है दृष्टिकोणों में
जो हीरा देख नहीं पाते,
जब विश्व हिंदी को सीख रहा
हम हिंदी नहीं सिखा पाते।

करो प्रेम सभी भाषाओं से
ये भाषाएं तो बहने हैं
हृदय से हिंदी को धारो
यही भाव हृदय के गहने हैं।

नहीं मिलती नौकरी हिंदी से
ऐसी तुला में मत तोलो,
हिंदी है हीन-ये सोच कभी
नन्हे बच्चों में मत घोलो।

गर्व उसी मस्तक को है
जो स्वाभिमान से जीता है,
हिंदी का प्रेमी विनम्र तो है ,
पर राज हृदय पर करता है।

चौदह सितंबर को हर वर्ष
यदि एक दिवस हम जागेंगे,
इस कालिंदी को गंगा सम
शिव जटा पे कैसे धारेंगे?

शिव जटा पे कैसे धारेंगे?